Mother Teresa Biography in Hindi – मदर टेरेसा का जीवन परिचय

Last Updated on August 16, 2026 by Virender Yadav

Mother Teresa का नाम दुनिया भर में सेवा, करुणा और मानवता की मिसाल के रूप में लिया जाता है। उन्होंने अपना पूरा जीवन गरीबों, बीमारों, अनाथ बच्चों और असहाय लोगों की सेवा के लिए समर्पित कर दिया। कोलकाता की झुग्गी-बस्तियों से शुरू हुआ उनका सेवा कार्य आगे चलकर पूरी दुनिया में फैल गया और उनकी संस्था Missionaries of Charity ने लाखों जरूरतमंद लोगों तक सहायता पहुँचाई।

वर्ष 1979 में उन्हें मानव सेवा के लिए नोबेल शांति पुरस्कार (Nobel Peace Prize) से सम्मानित किया गया। बाद में 2016 में कैथोलिक चर्च ने उन्हें संत टेरेसा ऑफ कोलकाता (Saint Teresa of Calcutta) घोषित किया। उनका जीवन केवल दान-पुण्य की कहानी नहीं है, बल्कि यह दृढ़ संकल्प, त्याग और निस्वार्थ सेवा का ऐसा उदाहरण है, जो आज भी करोड़ों लोगों को प्रेरित करता है।

परिचय (Quick Overview)

mother-teresa
विवरणजानकारी
पूरा नामएंजेझे गोंझे बोयाजियू
प्रसिद्ध नाममदर टेरेसा
जन्म26 अगस्त 1910
जन्म स्थानस्कोप्जे (वर्तमान उत्तर मैसेडोनिया)
पितानिकोला बोयाजियू
माताड्राना बोयाजियू
भारत आगमन1929
भारतीय नागरिकता1951
संस्थाMissionaries of Charity
नोबेल पुरस्कार1979
निधन5 सितंबर 1997

जन्म और प्रारंभिक जीवन

मदर टेरेसा का जन्म 26 अगस्त 1910 को उस समय के ओटोमन साम्राज्य के स्कोप्जे शहर में हुआ था, जो आज उत्तर मैसेडोनिया की राजधानी है। उनका मूल नाम एंजेझे गोंझे बोयाजियू था। वे एक अल्बानियाई मूल के धार्मिक परिवार में पैदा हुई थीं, जहाँ बचपन से ही दूसरों की सहायता करना और ईश्वर की सेवा को जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता था।

उनके पिता निकोला बोयाजियू एक व्यवसायी होने के साथ-साथ सामाजिक कार्यों में भी सक्रिय थे। जब मदर टेरेसा लगभग आठ वर्ष की थीं, तब उनके पिता का निधन हो गया। इस घटना ने उनके जीवन पर गहरा प्रभाव डाला। उनकी माता ड्राना बोयाजियू ने उन्हें कठिन परिस्थितियों में पाला और हमेशा गरीबों तथा जरूरतमंदों की सहायता करने की सीख दी।

बचपन से ही वे चर्च की गतिविधियों में हिस्सा लेती थीं। लगभग 12 वर्ष की आयु में उनके मन में यह विचार आया कि वे अपना जीवन धार्मिक सेवा और मानव कल्याण के लिए समर्पित करेंगी।

शिक्षा

मदर टेरेसा ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा स्कोप्जे के स्थानीय विद्यालयों में प्राप्त की। पढ़ाई के साथ-साथ उन्हें संगीत और धार्मिक गतिविधियों में भी विशेष रुचि थी।

18 वर्ष की आयु में उन्होंने अपना घर छोड़ दिया और आयरलैंड जाकर Sisters of Loreto संस्था में शामिल हो गईं। यहीं उन्होंने अंग्रेज़ी भाषा सीखी, क्योंकि भारत में मिशनरी कार्य के लिए अंग्रेज़ी आवश्यक थी।

कुछ समय बाद उन्हें भारत भेजा गया, जहाँ उनका जीवन पूरी तरह बदल गया।

परिवार

सदस्यनाम
पितानिकोला बोयाजियू
माताड्राना बोयाजियू
भाईलाज़र बोयाजियू
बहनआगा बोयाजियू

धार्मिक जीवन अपनाने के बाद मदर टेरेसा ने विवाह नहीं किया। उन्होंने स्वयं को पूरी तरह मानव सेवा के लिए समर्पित कर दिया।

भारत आगमन और Career की शुरुआत

साल 1929 में मदर टेरेसा भारत पहुँचीं और कोलकाता के लोरेटो कॉन्वेंट में अध्यापन कार्य शुरू किया। वे छात्राओं को इतिहास और भूगोल पढ़ाती थीं और धीरे-धीरे विद्यालय की प्रधानाचार्य भी बनीं।

लेकिन विद्यालय के बाहर फैली गरीबी, बीमारी और बेघर लोगों की हालत देखकर उनका मन बेचैन रहने लगा। वर्ष 1946 में दार्जिलिंग की यात्रा के दौरान उन्हें ऐसा अनुभव हुआ जिसे उन्होंने “Call within a Call” कहा। उनके अनुसार, उसी समय उन्हें यह महसूस हुआ कि उन्हें विद्यालय छोड़कर सीधे गरीबों के बीच जाकर सेवा करनी चाहिए।

1948 में उन्होंने कॉन्वेंट छोड़ दिया, भारतीय नागरिकता अपनाई और कोलकाता की झुग्गियों में रहकर लोगों की सेवा शुरू कर दी। उन्होंने नीली किनारी वाली सफेद सूती साड़ी पहननी शुरू की, जो आगे चलकर उनकी पहचान बन गई।

Missionaries of Charity की स्थापना

साल 1950 मदर टेरेसा के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण वर्ष साबित हुआ। इसी वर्ष उन्होंने Missionaries of Charity की स्थापना की। इस संस्था का उद्देश्य था—”सबसे गरीब और सबसे असहाय लोगों की निःस्वार्थ सेवा करना।”

शुरुआत कुछ ही सदस्यों के साथ हुई थी, लेकिन धीरे-धीरे यह संस्था दुनिया के अनेक देशों तक फैल गई।

संस्था ने:

  • अनाथ बच्चों के लिए आश्रय गृह खोले।
  • कुष्ठ रोगियों की सहायता की।
  • सड़क पर रहने वाले लोगों को भोजन और आश्रय दिया।
  • मरते हुए लोगों के लिए विशेष देखभाल केंद्र बनाए।
  • गरीब बच्चों की शिक्षा और चिकित्सा की व्यवस्था की।

आज भी Missionaries of Charity दुनिया के अनेक देशों में सेवा कार्य कर रही है।

संघर्ष और सफलता

मदर टेरेसा का रास्ता आसान नहीं था। जब उन्होंने झुग्गियों में सेवा शुरू की, तब उनके पास बहुत कम संसाधन थे। कई बार उन्हें भोजन, दवाइयाँ और आर्थिक सहायता जुटाने के लिए लोगों से सहयोग माँगना पड़ता था।

धीरे-धीरे स्वयंसेवकों और दानदाताओं की संख्या बढ़ती गई। उनके सेवा कार्यों की चर्चा दुनिया भर में होने लगी और वे मानवता की सबसे सम्मानित हस्तियों में शामिल हो गईं।

नोबेल शांति पुरस्कार

वर्ष 1979 में उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार प्रदान किया गया। इस पुरस्कार के दौरान उन्होंने परंपरागत भोज आयोजित करने से मना कर दिया और उस पर होने वाला खर्च गरीबों की सहायता के लिए देने का अनुरोध किया। यह घटना उनकी सादगी और सेवा भावना का एक यादगार उदाहरण मानी जाती है।

प्रमुख उपलब्धियाँ

  • Missionaries of Charity की स्थापना की।
  • लाखों गरीबों और बीमारों की सेवा की।
  • अनाथ बच्चों के लिए आश्रय गृह स्थापित किए।
  • कुष्ठ रोगियों और बेघर लोगों की सहायता की।
  • मानव सेवा के क्षेत्र में विश्वव्यापी पहचान प्राप्त की।
  • भारत रत्न और नोबेल शांति पुरस्कार जैसे प्रतिष्ठित सम्मान प्राप्त किए।

Awards एवं सम्मान

वर्षसम्मान
1962Ramon Magsaysay Award
1962पद्म श्री
1969जवाहरलाल नेहरू अंतरराष्ट्रीय समझ पुरस्कार
1979नोबेल शांति पुरस्कार
1980भारत रत्न
2016संत (Saint Teresa of Calcutta) घोषित

मदर टेरेसा से जुड़े कम ज्ञात तथ्य

मदर टेरेसा के जीवन से जुड़े कई ऐसे तथ्य हैं जिनके बारे में कम लोग जानते हैं।

  • वे अपना वास्तविक जन्मदिन 26 अगस्त के बजाय 27 अगस्त को विशेष रूप से याद करती थीं, क्योंकि उसी दिन उनका बपतिस्मा हुआ था।
  • उन्होंने पाँच भाषाओं—अंग्रेज़ी, हिंदी, बंगाली, अल्बानियाई और सर्बो-क्रोएशियाई – का ज्ञान प्राप्त किया।
  • भारत आने के बाद उन्होंने कुछ समय पटना में प्राथमिक चिकित्सा (Basic Medical Training) भी सीखी।
  • उन्होंने कोलकाता के मोतीझील क्षेत्र में गरीब बच्चों के लिए बिना संसाधनों के पहला स्कूल शुरू किया।
  • उनकी सफेद साड़ी पर नीली किनारी सेवा और सादगी का वैश्विक प्रतीक बन गई।

क्या मदर टेरेसा को लेकर विवाद भी रहे?

हाँ, उनके जीवन का यह पक्ष भी जानना जरूरी है।

समय-समय पर कुछ लेखकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने उनकी संस्था के कुछ आश्रय गृहों में चिकित्सा सुविधाओं और उपचार की गुणवत्ता को लेकर सवाल उठाए। दूसरी ओर उनके समर्थकों का कहना था कि उनका उद्देश्य आधुनिक अस्पताल चलाना नहीं, बल्कि उन लोगों को सम्मान और देखभाल देना था जिन्हें समाज पूरी तरह छोड़ चुका था।

इसी कारण मदर टेरेसा का जीवन केवल प्रशंसा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उनके कार्यों पर समय-समय पर गंभीर चर्चा भी होती रही। यह तथ्य उनकी जीवनी को संतुलित और अधिक विश्वसनीय बनाता है।

अंतिम समय

1990 के दशक में उनका स्वास्थ्य लगातार कमजोर होने लगा। हृदय संबंधी समस्याओं के बावजूद उन्होंने सेवा कार्य जारी रखा।

5 सितंबर 1997 को कोलकाता में उनका निधन हो गया। भारत सरकार ने उन्हें राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी, जो उनके योगदान के प्रति देश के सम्मान का प्रतीक था।

Net Worth

मदर टेरेसा की व्यक्तिगत Net Worth के संबंध में कोई प्रमाणित ऐतिहासिक जानकारी उपलब्ध नहीं है। उन्होंने अपना पूरा जीवन सेवा कार्यों के लिए समर्पित किया और व्यक्तिगत संपत्ति बनाने पर कभी ध्यान नहीं दिया।

रोचक तथ्य

  • उनका असली नाम एंजेझे गोंझे बोयाजियू था।
  • वे 18 वर्ष की आयु में घर छोड़कर आयरलैंड चली गई थीं।
  • उन्होंने भारत में लगभग 68 वर्ष तक सेवा कार्य किया।
  • उनकी संस्था 100 से अधिक देशों में सक्रिय रही।
  • उन्हें 1979 में नोबेल शांति पुरस्कार मिला।
  • उन्होंने पुरस्कार समारोह का भोज रद्द कर उसकी राशि गरीबों के लिए समर्पित करने की इच्छा जताई।
  • 2016 में उन्हें संत घोषित किया गया।
  • उनकी पहचान सफेद साड़ी और नीली किनारी से जुड़ी हुई है।

FAQ (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)

1. मदर टेरेसा का जन्म कब हुआ था?

मदर टेरेसा का जन्म 26 अगस्त 1910 को स्कोप्जे में हुआ था।

2. मदर टेरेसा भारत कब आई थीं?

वे 1929 में भारत आई थीं और बाद में कोलकाता में सेवा कार्य शुरू किया।

3. Missionaries of Charity की स्थापना कब हुई?

इस संस्था की स्थापना 1950 में हुई थी।

4. मदर टेरेसा को नोबेल पुरस्कार कब मिला?

उन्हें 1979 में नोबेल शांति पुरस्कार मिला था।

5. मदर टेरेसा को भारत रत्न कब मिला?

उन्हें 1980 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया।

6. उन्हें संत कब घोषित किया गया?

कैथोलिक चर्च ने 4 सितंबर 2016 को उन्हें संत घोषित किया।

7. मदर टेरेसा का असली नाम क्या था?

उनका असली नाम एंजेझे गोंझे बोयाजियू था।

निष्कर्ष

मदर टेरेसा का जीवन यह सिखाता है कि सच्ची महानता धन या प्रसिद्धि से नहीं, बल्कि दूसरों के दुख को अपना समझकर उनकी सहायता करने से मिलती है। उन्होंने अपना पूरा जीवन गरीबों, बीमारों और असहाय लोगों की सेवा में लगा दिया। उनके कार्यों की प्रशंसा और आलोचना दोनों हुईं, लेकिन यह निर्विवाद है कि उन्होंने मानव सेवा को वैश्विक स्तर पर नई पहचान दिलाई। आज भी उनका जीवन करुणा, त्याग और निस्वार्थ सेवा की प्रेरणा देता है।

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