Bhagat Singh Biography In Hindi भगत सिंह जीवन परिचय (जीवनी)

Last Updated on August 16, 2026 by Virender Yadav

Bhagat Singh Biography In Hindi – भारत के स्वतंत्रता संग्राम में अनेक वीरों ने अपने प्राणों का बलिदान दिया, लेकिन शहीद-ए-आज़म भगत सिंह का नाम आज भी करोड़ों भारतीयों के दिलों में उसी सम्मान के साथ लिया जाता है। उन्होंने केवल 23 वर्ष की आयु में देश की आजादी के लिए अपना जीवन न्योछावर कर दिया। उनका जीवन साहस, त्याग, राष्ट्रप्रेम और क्रांतिकारी विचारों का ऐसा उदाहरण है जो आज भी युवाओं को प्रेरित करता है।

भगत सिंह केवल एक क्रांतिकारी नहीं थे, बल्कि वे एक गंभीर विचारक, लेखक और समाजवादी सोच रखने वाले युवा भी थे। जेल में रहते हुए उन्होंने कई लेख और पत्र लिखे, जिनमें Why I Am an Atheist जैसे प्रसिद्ध लेख भी शामिल हैं। उनकी सोच केवल अंग्रेज़ों को भारत से बाहर निकालने तक सीमित नहीं थी, बल्कि वे एक समानता और न्याय पर आधारित भारत का सपना देखते थे।

Bhagat Singh Biography In Hindi – जन्म, शिक्षा, परिवार, क्रांतिकारी जीवन, शहादत, विचार, रोचक तथ्य

Bhagat Singh Biography In Hindi

परिचय (Quick Overview)

विवरणजानकारी
पूरा नामभगत सिंह संधू
प्रसिद्ध नामशहीद-ए-आज़म भगत सिंह
जन्म27 सितंबर 1907
जन्म स्थानबंगा गाँव, लायलपुर (अब पाकिस्तान)
पिताकिशन सिंह
माताविद्यावती
संगठनHindustan Socialist Republican Association (HSRA)
प्रसिद्ध नाराइंकलाब ज़िंदाबाद
शहादत23 मार्च 1931
आयु23 वर्ष

जन्म और प्रारंभिक जीवन

भगत सिंह का जन्म 27 सितंबर 1907 को पंजाब प्रांत के बंगा गाँव में हुआ था, जो उस समय ब्रिटिश भारत का हिस्सा था और आज पाकिस्तान में स्थित है। उनका जन्म ऐसे परिवार में हुआ था जहाँ देशभक्ति वातावरण का हिस्सा थी। उनके पिता किशन सिंह, चाचा अजीत सिंह और चाचा स्वर्ण सिंह स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े हुए थे।

कहा जाता है कि जब भगत सिंह का जन्म हुआ, उसी दिन उनके पिता और चाचा जेल से रिहा हुए थे। परिवार ने इसे शुभ संकेत माना।

जलियांवाला बाग की घटना का प्रभाव

1919 में हुए जलियांवाला बाग हत्याकांड ने बालक भगत सिंह के मन पर गहरा प्रभाव डाला। घटना के अगले दिन वे अमृतसर पहुँचे और वहाँ की मिट्टी अपने साथ लेकर आए। यही घटना उनके भीतर अंग्रेज़ी शासन के प्रति विरोध की भावना को और मजबूत बनाने वाली मानी जाती है।

विकिपीडिया पर देखेंभगत सिंह

भगत सिंह का जन्म 27 सितम्बर, 1907, पंजाब के नवांशहर जिले के खटकर कलां गावं के एक सिख परिवार में हुआ था, बचपन से ही इनके अंदर देश भकित कूट – कूट कर भरी थी जिसकी वजह से यह देश सेवा के लिए हमेशा तत्पर रहा करते थे। इनके जन्म के बारे में कुछ और बातें भी कही जाती है जैसे की इनका जन्म लायलपुर ज़िले के बंगा में (अब पाकिस्तान में) हुआ था पिता का नाम किशन सिंह और माता का विद्यावती था। भगत सिंह विद्यावती की तीसरी संतान थे।

Bhagat Singh Biography In Hindi स्कूली शिक्षा –

भगत सिंह बचपन से ही पढ़ाई में रुचि रखते थे। उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा गाँव के विद्यालय से प्राप्त की और बाद में Dayanand Anglo-Vedic (DAV) School, लाहौर में पढ़ाई की।

जब महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन शुरू किया, तब उन्होंने सरकारी शिक्षा संस्थानों का बहिष्कार किया और National College, Lahore में प्रवेश लिया। यह कॉलेज लाला लाजपत राय द्वारा स्थापित किया गया था और यहाँ देशभक्ति तथा क्रांतिकारी विचारों का विशेष प्रभाव था।

किन पुस्तकों से प्रभावित हुए?

भगत सिंह ने भारतीय और विदेशी क्रांतिकारियों के विचारों का गहराई से अध्ययन किया। उन्होंने कार्ल मार्क्स, लेनिन और अन्य विचारकों की रचनाएँ पढ़ीं, जिससे उनके राजनीतिक और सामाजिक विचार विकसित हुए।

भगत सिंह का परिवार

भगत सिंह का परिवार स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय था।

सदस्यनाम
पिताकिशन सिंह
माताविद्यावती
चाचाअजीत सिंह
चाचास्वर्ण सिंह

उनकी माता विद्यावती ने अपने पुत्र के भीतर देशप्रेम और साहस की भावना बचपन से विकसित की। परिवार चाहता था कि वे सुरक्षित जीवन जिएँ, लेकिन भगत सिंह ने राष्ट्रहित को सर्वोच्च माना।

Career की शुरुआत

यदि भगत सिंह के Career की बात करें, तो उनका जीवन किसी नौकरी या व्यवसाय के बजाय पूरी तरह स्वतंत्रता संग्राम को समर्पित था।

उन्होंने युवाओं को संगठित करने के लिए नौजवान भारत सभा की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बाद में वे Hindustan Socialist Republican Association (HSRA) से जुड़े और संगठन के प्रमुख क्रांतिकारियों में शामिल हो गए।

वे समाचार पत्रों में भी लेख लिखते थे और कई बार अलग-अलग नामों से अपने विचार प्रकाशित करते थे। उनका उद्देश्य युवाओं में राष्ट्रीय चेतना जगाना था।

संघर्ष और सफलता

साइमन कमीशन का विरोध

1928 में जब साइमन कमीशन भारत आया, तब पूरे देश में उसका विरोध हुआ। इसी दौरान लाहौर में हुए लाठीचार्ज में लाला लाजपत राय गंभीर रूप से घायल हुए और बाद में उनका निधन हो गया। इस घटना ने भगत सिंह और उनके साथियों को झकझोर दिया।

सॉन्डर्स की हत्या

लाला लाजपत राय की मृत्यु का बदला लेने के उद्देश्य से भगत सिंह, राजगुरु और उनके साथियों ने ब्रिटिश अधिकारी जॉन पी. सॉन्डर्स को गोली मार दी। यह घटना भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन का महत्वपूर्ण मोड़ बन गई।

विधानसभा में बम फेंकना

8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने केंद्रीय विधानसभा (Central Legislative Assembly) में ऐसे बम फेंके जिनका उद्देश्य किसी की हत्या करना नहीं, बल्कि अंग्रेज़ी शासन के खिलाफ आवाज़ बुलंद करना था। बम फेंकने के बाद उन्होंने भागने के बजाय स्वयं गिरफ्तारी दी ताकि अदालत को अपने विचार रखने का मंच बना सकें।

जेल जीवन और ऐतिहासिक भूख हड़ताल

गिरफ्तारी के बाद भगत सिंह ने जेल में भारतीय कैदियों के साथ हो रहे भेदभाव के खिलाफ लंबी भूख हड़ताल की। उनकी माँग थी कि भारतीय राजनीतिक कैदियों को भी यूरोपीय कैदियों के समान सुविधाएँ मिलनी चाहिए।

इस आंदोलन ने पूरे देश का ध्यान उनकी ओर आकर्षित किया और वे युवाओं के सबसे बड़े प्रतीकों में शामिल हो गए।

विचार और लेखन

भगत सिंह केवल हथियार उठाने वाले क्रांतिकारी नहीं थे। वे एक गहरे चिंतक भी थे।

उनके कुछ प्रसिद्ध लेख हैं—

  • Why I Am an Atheist
  • जेल नोटबुक (Jail Notebook)
  • विभिन्न पत्र और राजनीतिक लेख

इन लेखों में उन्होंने तर्क, समानता, समाजवाद और वैज्ञानिक सोच पर अपने विचार रखे।

शहादत

23 मार्च 1931 को लाहौर सेंट्रल जेल में भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फाँसी दे दी गई। उस समय उनकी आयु केवल 23 वर्ष थी। उनकी शहादत की खबर पूरे देश में फैल गई और लाखों लोग उनके सम्मान में सड़कों पर उतर आए।

आज 23 मार्च को भारत में शहीद दिवस के रूप में याद किया जाता है।

प्रमुख उपलब्धियाँ

  • भारतीय युवाओं को स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ा।
  • HSRA के प्रमुख क्रांतिकारी बने।
  • विधानसभा बम कांड के माध्यम से अंग्रेज़ी शासन के खिलाफ आवाज़ बुलंद की।
  • जेल में राजनीतिक कैदियों के अधिकारों के लिए संघर्ष किया।
  • अपने लेखन से क्रांतिकारी विचारधारा को नई दिशा दी।
  • “इंकलाब ज़िंदाबाद” को राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक बनाया।

Awards एवं सम्मान

हालाँकि स्वतंत्र भारत से पहले उन्हें कोई सरकारी पुरस्कार नहीं मिला, लेकिन आज देशभर में उनके सम्मान में—

  • हुसैनीवाला राष्ट्रीय शहीद स्मारक
  • अनेक विश्वविद्यालय, विद्यालय और सड़कें
  • डाक टिकट और स्मारक सिक्के
  • कई फ़िल्में और वृत्तचित्र

उनकी स्मृति को जीवित रखते हैं।

Net Worth

भगत सिंह का जीवन पूरी तरह राष्ट्र सेवा को समर्पित था। इसलिए उनकी व्यक्तिगत Net Worth से संबंधित कोई प्रमाणित ऐतिहासिक जानकारी उपलब्ध नहीं है।

रोचक तथ्य

  • भगत सिंह को शहीद-ए-आज़म कहा जाता है।
  • उन्होंने पहचान छिपाने के लिए अपने बाल और दाढ़ी कटवाई थी।
  • वे कई भाषाओं में पढ़ते और लिखते थे।
  • उन्होंने जेल में लंबी भूख हड़ताल की थी।
  • उनका प्रसिद्ध नारा “इंकलाब ज़िंदाबाद” आज भी गूंजता है।
  • वे केवल 23 वर्ष की आयु में शहीद हुए।
  • वे तर्कवाद और वैज्ञानिक सोच के समर्थक थे।
  • उन्होंने अदालत को अपने विचार रखने का मंच बनाया।

“गांधी जी चाहते तो भगत सिंह बच सकते थे” — इसे इतिहासकार सिद्ध तथ्य (proven fact) नहीं मानते। यह एक ऐतिहासिक विवाद (historical debate) है, जिस पर अलग-अलग इतिहासकारों की अलग राय है।

क्या सच में गांधी जी भगत सिंह को बचा सकते थे?

1931 में गांधी जी और वायसराय लॉर्ड इरविन के बीच Gandhi-Irwin Pact हुआ था। इसी समय भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फाँसी की सज़ा सुनाई जा चुकी थी। यहीं से यह बहस शुरू हुई कि क्या गांधी जी इस समझौते में उनकी फाँसी रुकवा सकते थे।

जो तथ्य रिकॉर्ड में मौजूद हैं

  • गांधी जी ने वायसराय इरविन से भगत सिंह की फाँसी को कम करने (commute करने) की अपील की थी।
  • उन्होंने 19 मार्च 1931 की मुलाकात में भी इस विषय को उठाया।
  • 23 मार्च 1931 को उन्होंने एक पत्र भी लिखा, जिसमें फाँसी रोकने का अनुरोध किया।
  • लेकिन ब्रिटिश सरकार ने यह अनुरोध स्वीकार नहीं किया।

फिर लोग गांधी जी को दोष क्यों देते हैं?

कुछ इतिहासकार और आलोचक कहते हैं कि:

  • गांधी जी Gandhi-Irwin Pact में भगत सिंह की रिहाई या सज़ा कम करने को शर्त बना सकते थे।
  • उन्होंने इसे समझौते की अनिवार्य शर्त नहीं बनाया।
  • इसलिए उन्होंने पर्याप्त राजनीतिक दबाव नहीं डाला।

दूसरी ओर इतिहासकार क्या कहते हैं?

कई शोधकर्ताओं का कहना है कि:

  • अंतिम फैसला ब्रिटिश सरकार के हाथ में था।
  • गांधी जी के पास कानूनी अधिकार नहीं था कि वे फाँसी रोक दें।
  • उन्होंने कोशिश की, लेकिन उनकी मांग मानना ब्रिटिश सरकार के लिए राजनीतिक रूप से स्वीकार्य नहीं था।

क्या भगत सिंह ने खुद माफ़ी माँगने से इनकार किया था?

हाँ, यह बात ऐतिहासिक रिकॉर्ड में मिलती है।

  • भगत सिंह ने दया-याचिका (Mercy Petition) पर हस्ताक्षर करने से इनकार किया।
  • उन्होंने ब्रिटिश सरकार से कहा कि उन्हें अपराधी नहीं बल्कि युद्धबंदी (Prisoner of War) माना जाए।
  • उन्होंने फाँसी के बजाय गोली से मृत्यु देने की मांग की थी।

क्या फाँसी समय से पहले दी गई थी?

हाँ, यह एक महत्वपूर्ण तथ्य है।

  • आधिकारिक रूप से फाँसी 24 मार्च की सुबह होने की उम्मीद थी।
  • लेकिन 23 मार्च 1931 की शाम को ही तीनों को फाँसी दे दी गई।
  • कई इतिहासकार मानते हैं कि ऐसा संभावित जनाक्रोश से बचने के लिए किया गया।

जो बातें अक्सर सोशल मीडिया पर वायरल होती हैं (Fact Check)

दावासच्चाई
गांधी जी चाहते तो एक मिनट में फाँसी रुक जाती❌ इसका कोई पक्का ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है।
गांधी जी ने जानबूझकर भगत सिंह को मरने दिया❌ यह सिद्ध तथ्य नहीं है।
गांधी जी ने फाँसी रोकने की कोशिश नहीं की❌ रिकॉर्ड में उनकी अपील और बातचीत का उल्लेख मिलता है।
भगत सिंह ने दया-याचिका ठुकराई✅ ऐतिहासिक रिकॉर्ड इसका समर्थन करते हैं।
फाँसी तय समय से पहले दी गई✅ इसे कई ऐतिहासिक स्रोत दर्ज करते हैं।

FAQ (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)

1. भगत सिंह का जन्म कब हुआ था?

भगत सिंह का जन्म 27 सितंबर 1907 को बंगा गाँव, लायलपुर (वर्तमान पाकिस्तान) में हुआ था।

2. भगत सिंह की मृत्यु कब हुई?

उन्हें 23 मार्च 1931 को लाहौर सेंट्रल जेल में फाँसी दी गई थी।

3. भगत सिंह किस संगठन से जुड़े थे?

वे Hindustan Socialist Republican Association (HSRA) के प्रमुख सदस्य थे।

4. उनका प्रसिद्ध नारा क्या था?

उनका सबसे प्रसिद्ध नारा “इंकलाब ज़िंदाबाद” था।

5. उन्होंने विधानसभा में बम क्यों फेंका था?

उन्होंने अंग्रेज़ी शासन के दमनकारी कानूनों के खिलाफ विरोध दर्ज कराने और अपनी बात जनता तक पहुँचाने के लिए Central Legislative Assembly में बम फेंका था।

6. भगत सिंह की सबसे प्रसिद्ध रचना कौन-सी है?

उनका प्रसिद्ध लेख “Why I Am an Atheist” व्यापक रूप से पढ़ा जाता है।

निष्कर्ष

भगत सिंह का जीवन केवल इतिहास का एक अध्याय नहीं, बल्कि साहस, विचार और त्याग की ऐसी प्रेरक गाथा है जो हर पीढ़ी को राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्य का एहसास कराती है। उन्होंने अपने छोटे से जीवन में यह सिद्ध कर दिया कि महानता उम्र से नहीं, बल्कि उद्देश्य और साहस से तय होती है। उनकी शहादत ने स्वतंत्रता आंदोलन को नई ऊर्जा दी और आज भी उनका नाम भारतीय युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है।

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